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Wednesday, December 07, 2011

सुख की अनुभूति

‘‘ किसी इन्सान के भीतर महसूस किया जानेवाला वह परंम आनन्द जिसे मात्र अनुभव किया जा सकता है और जो समय व परिस्थिति के अनुसार क्षणिक परिवर्तित होता रहता है ‘‘

आज अवकाष के दिन प्रातः धर्म पत्नी के साथ चाय की चुस्कियॉ लेते हुए मौसम का आनन्द ले रहा था कि मूड अच्छा जानकर उसने बोला सुनों जी एक ऐसा बडा घर बनाओं जिसके चारों तरफ हरियाली हो तो मै सुखी हो जाऊं ।
      इस छोटी सी बात को बोल कर वह तो कुछ देर में भूल गई लेकिन मेरा मन उसमें उलझ कर रह गया । मै सोचने लगा कि यह सुख है क्या ?
 मुझे लगा कि क्यों आज अधिकाषं जन मानस इस भाग दौड भरी जिन्दगी में पैसा, भौतिक सुख सुविधाएंॅ व चकाचौध कर देने वाले वैभव को प्राप्त करने के लिए एक अन्धाधुन्ध दौड लगा रहा है क्या यही सच्चा सुख है या सफलता प्राप्त करना ही सच्चा सुख है ? लेकिन यह देखने में आया है कि प्रत्येक सफल व्यक्ति सुखी नहीं होता तो फिर सच्चा सुख क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ।
 हम सुख को इस प्रकार परिभाषित कर सकते है ‘‘ किसी इन्सान के भीतर महसूस किया जानेवाला वह परंम आनन्द जिसे मात्र अनुभव किया जा सकता है और जो समय व परिस्थिति के अनुसार क्षणिक परिवर्तित होता रहता है ‘‘ । क्योंकि यह सर्व विख्यात है कि ‘‘पहला सुख निरोगी काया‘‘ तो यह सर्वथा ठीक ही है । क्योकि शरीर निरोग होगा तभी हम परम आनन्द का अनुभव कर सकते है । फिर भी हम अपनी इच्छाओं को सीमित रखते हुए कुछ छोटे छोटे उपाय करें तो सुख का अनुभव जरूर मिलता है ।
(1) यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक इन्सान के अपने कर्तव्य व मर्यादा है । अतः अपने बनाये नियम कायदों को किसी पर थोपने की कोषिष नहीं करनी चाहिए । आप परिवार में अपने नियमों के फायदें नुकसान जरूर समझा दें ।
(2) प्रतिदिन कोई न कोई समस्या हमारे जीवन में आती है उसका शोर्टकट समाधान न निकाले क्योंकि पूर्व में किये गये शोर्ट कट और बिना सोचे समाधान के कारण ही 90 प्रतिषत समस्याऐं पैदा होती है ।
(3) अपने सामर्थ्य व पसंद के अनुसार व्यस्त रहने की कोषिष करें क्योंकि अथाह धन होने के बावजूद कर्महीन व निठ्ल्ले व्यक्ति को आत्म सुख नहीं मिलता है ।
(4) परिस्थितियोंॅ सदा बदलती रहती है अतः अपने आर्थिक व भौतिक साधनों की तुलना करने से बचे । इन्सान कर्म से महान होता है ना कि धन से ।
(5) सदैव वर्तमान में जीते हुए आषावादी व प्रसन्न रहने की कोषिष करनी चाहिए क्योंकि दूसरों की बुराई करने और अपना रोना रोने से आप सहानुभुति प्राप्त कर सकते है किन्तु सुख प्राप्त नहीं कर सकते ।
(6) आपके द्वारा गलती होने पर क्षमा मांगना सीखे और अनजाने में किसी व्यक्ति द्वारा की गयी गलती केा क्षमा करना सीखें किन्तु बार बार की गयी गलती पर दंण्ड अवष्यदें ।
(7) सदैव दूसरों का दुखःबांटने की कोषिष करें इससे 100 प्रतिषत आत्म सुख का अनुभव होगा ।
(8) अपने कर्म को ईमानदारी निष्ठा लगन के साथ करें यह आपको आने वाले समय में धन यष और स्वास्थ्य देगा । जिससे आप सम्पन्न सफल और सुखी बनेगें ।
(9) भौतिक साधन जीवन को सरल बना सकते है परन्तु सुखी नहीं । अतः जहोंॅ तक संभव हो सन्तुष्ट रहने की और वर्तमान में जीने की कोषिष करें ।
(10)  जैसी हमारी कामना होती है वैसी ही हमारी इच्छा शक्ति होती है उसी के अनुसार हम कर्म करते है एवं कर्म के अनुसार हमारी नियति बन जाती है अतः अपनी इच्छाओं/कामनाओं को सही दिषा में आगे बढायें ।
(11) प्रतिदिन तीनों प्रहर शान्त बैठकर दो मिनट स्वयं के कार्यो का आंकलन जरूर करें ।
       अन्त में कहना चाहूंगा कि गीता का यह सार स्मरण रखें कि जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छा होगा एवं कठोर परिश्रम का प्रतिफल ही सच्चा सुख है ।